आज हमने फिर से एक कमाल का करिश्मा देखा

Warning: Illegal string offset 'ID' in /home/customer/www/literaryforum.org/public_html/wp-content/themes/arte-child/single-article.php on line 17

Notice: Uninitialized string offset: 0 in /home/customer/www/literaryforum.org/public_html/wp-content/themes/arte-child/single-article.php on line 17

Warning: Illegal string offset 'ID' in /home/customer/www/literaryforum.org/public_html/wp-content/themes/arte-child/single-article.php on line 20

Notice: Uninitialized string offset: 0 in /home/customer/www/literaryforum.org/public_html/wp-content/themes/arte-child/single-article.php on line 20
आज हमने फिर से एक कमाल का करिश्मा देखा

आज हमने फिर से एक कमाल का करिश्मा देखा

ख़ुश्क, प्यासी, तपती धरती के सीने मे,

अचानक पता नहीं कहाँ से कुछ बादलों ने

ढ़ेर सारा बारिश का पानी उढ़ेल दिया

टिप टिप पड़ती बूंदों ने जैसे धरती को फिर से जवाँ कर दिया

उसकी झुरिआं कुछ ही पलों में खो सी गईं

उसकी खुशबू चंद ही मिनटों में बदल सी गयी

फिर हवा चली, पेड़ भी झूमे, मस्त झूमे

पत्तियों ने भी पक्षियों के साथ मिलकर खूब संगीत बनाया

मानो सारी फिज़ा में एक रुमानी सी छा गयी हो

दिल मे आया की कैसे बांध लूँ इन पलों को अपने तकिये से

और सो जायूँ उसपे सर रख कर

या पी लूँ इन बारिश की बूंदों को, और हमेशां के लिए अपना बना लूँ

फ़िर एक बिजली कौंधी, बादल गड़गड़ाये

और दिल खोल के बरसे

जैसे अपना सब कुछ लुटा रहे हों

जैसे पूरी धरती में बाँट रहें हों अपने को

जैसे सब की रुमानियत में ही उनकी रुहानियत भी छिपी हो

वाह! एक बड़ा गहरा राज़ खोल गए ये बादल आज

सिखा गए, की बांटने से ही तुम्हारी रुहानियत भी खिलेगी

यूँ तो सब अकेले, प्यासे भटक ही रहे हैं

तुम अपने हृदय के बादलों से

बस सब पर प्रेम की वर्षा कर दो

और फ़िर से एक बार इस धरती के ज़ख्मो को भर दो

बरसो, खूब बरसो, तब तक बरसो

जब तक बारिश की एक बूँद भी तुम्हारे भीतर शेष है

रुको मत, डरो मत, अनन्त सागरों का जल तुम्हे भरने को तत्पर है

बरसो, खूब बरसो और प्रेम की गंगाओं को लबालब भर दो

क्योंकि, आज हमने फ़िर से एक कमाल का करिश्मा देखा।


Warning: Illegal string offset 'ID' in /home/customer/www/literaryforum.org/public_html/wp-content/themes/arte-child/single-article.php on line 117

Notice: Uninitialized string offset: 0 in /home/customer/www/literaryforum.org/public_html/wp-content/themes/arte-child/single-article.php on line 117

Warning: Illegal string offset 'ID' in /home/customer/www/literaryforum.org/public_html/wp-content/themes/arte-child/single-article.php on line 118

Notice: Uninitialized string offset: 0 in /home/customer/www/literaryforum.org/public_html/wp-content/themes/arte-child/single-article.php on line 118

Warning: Illegal string offset 'ID' in /home/customer/www/literaryforum.org/public_html/wp-content/themes/arte-child/single-article.php on line 119

Notice: Uninitialized string offset: 0 in /home/customer/www/literaryforum.org/public_html/wp-content/themes/arte-child/single-article.php on line 119

Anthology

आकाश नीचे उतर आया

Poetry by Omendra Ratnu

आज एक आकाश नीचे उतर आया करने आच्छादित मुझे, मेरे उपरान्त भी ,   अस्तित्व हुआ तरल झीनी चादर सा, चित्त हुआ सरल , जो था कातर सा,   तन...
read more

Who was I?

Poetry by Bettina

Who was I before I forgot your face? Who was I before I forgot your name? Who was I before? My mother’s face, my father’s face, my brother’s face. Mother...
read more

जो रो ना सके वो जवानी क्या

Poetry by Omendra Ratnu

जो रो ना सके वो जवानी क्या ! जो हंस ना सके वो बुढ़ापा क्या ! जो चल ना सके वो हौसला क्या ! जो मिट ही जाए वो फासला...
read more

Previous Next
Close
Test Caption
Test Description goes like this