अब और क्या माँगू ?
अब और क्या माँगू ?

मैं तुझसे पा गया इतना , अब और क्या माँगू ?
कि दामन भर गया मेरा, अब और क्या माँगू ?

हद-ए-नज़र तक है यहाँ आलम मुफ़लिसी का
मैं इतनी  रौनकों से घिरा, अब और क्या माँगू ?
भरे जा झोलियाँ उनकी दिलों में जिनके ग़ुरबत है हुआ मैं शाह शाहों का ,अब और क्या माँगू  ?

लुटा दे दौलतें उन पर  जिन्हें दरकार हो उसकी ,
झलक मैं पा गया तेरी, अब और क्या माँगू ?

वो पण्डे मौलवी बतलाने राह जन्नत की आये थे,
मैं पाया रहबरी तेरी , अब और क्या माँगू ?

नज़र तेरी, जुबां तेरी,  हवस तेरी,  समझ तेरी,
मेरा होना ही तुझसे है , अब और क्या माँगू ?

Omendra Ratnu

Dr. Omendra Ratnu is a Jaipur based ENT surgeon who runs his own hospital. Survival and blossoming of Hindi Bhasha by enhancing it’s use and promoting Hindi literature is one of his core passions.

He has been writing poetry and articles in various newspapers and web portals of Bharat. He runs an NGO by the title of Nimittekam, with the main purpose of helping displaced Hindu refugees from Pakistan and integrating Dalit Sahodaras into Hindu mainstream. Issues of the survival of Sanatana Dharma are also one of his core concerns for which he roams around the world to raise funds and awareness. He is also a singer, composer, Geeta communicator, and a ground activist for Hindu causes. He has released a Bhajan album and a Ghazal album composed and sung by him.

Ouevre

अरी ओ आत्मा री

Poetry by Omendra Ratnu

अरी ओ आत्मा री ! कन्या ,भोली , कुंवारी ! हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़ ! महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई, अब तो चैतन्य...
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मन के अनुसंधान समझ

Poetry by Omendra Ratnu

मन के अनुसंधान समझ, शब्दों के परिधान पहन …ये कौन आह जगी ? शीतलता से उत्तप्त, सभी स्मृतियों से विगत, क्षितिज पे जागती जोत सी ….ये कौन आह जगी ?...
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लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए

Poetry by Omendra Ratnu

लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए , पर इस दिवाली पे आप बार बार आए … वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने , हर दस्तूर के हमको समझाना माने , स्मृतियों की पालकी सपनों...
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Anthology

You are an Era

Poetry by Sanaya

You are an era And I am a tourist, reading A history book about you. I went through the several phases — Old school rock, 60’s jazz and retro The...
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रस्मो-रिवाज

Poetry by Omendra Ratnu

रस्मो-रिवाज वो निभाएं जिन्हें ग़रज़ हो दुनिया वालों से, ना रुसवाई का कोई डर था ना था खौफ पशेमान होने से , खुद को मिटाने की कसम पे चले हैं वफ़ा...
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Perhaps

Poetry by Arwa Qutbuddin

Perhaps we need to shatter and scatter so that we may trace our way back inward slowly – breath by breath – into the wholeness of existence And as we...
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