अब प्यार हुआ इलज़ाम
अब प्यार हुआ इलज़ाम

अब प्यार हुआ इलज़ाम यहाँ, है मक्कारों की पौ बारह,

नफरत में जीना आसान है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहूँचे !

क्या शोर हुआ, क्या ज़ोर हुआ,यूँ मर मर के मैं और हुआ,

बस बाकी होश ज़रा सा है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहूँचे !

कोई आँख भरी ना ठंडक से, कोई हाथ नहीं है कंधे पर,

हर शख्स यहाँ घबराया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहूँचे !

ना सत्य सुना,ना वाद सुना, ना कल कल जल का नाद सुना,

इक कर्कश स्वर भर आया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहूँचे !

करुणा की गंध भी महकी थी, मुक्ति की हवा भी बहकी थी,

खुदगर्ज़ी ने भरमाया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहूँचे !

तलवार उठा और बाँध कमर, अब आँख उठा और देख सहर,

आने वाली नस्लें न कहें, अफ़सोस कहाँ हम आ पहूँचे !

Omendra Ratnu

Dr. Omendra Ratnu is a Jaipur based ENT surgeon who runs his own hospital. Survival and blossoming of Hindi Bhasha by enhancing it’s use and promoting Hindi literature is one of his core passions.

He has been writing poetry and articles in various newspapers and web portals of Bharat. He runs an NGO by the title of Nimittekam, with the main purpose of helping displaced Hindu refugees from Pakistan and integrating Dalit Sahodaras into Hindu mainstream. Issues of the survival of Sanatana Dharma are also one of his core concerns for which he roams around the world to raise funds and awareness. He is also a singer, composer, Geeta communicator, and a ground activist for Hindu causes. He has released a Bhajan album and a Ghazal album composed and sung by him.

Ouevre

उठूँ तुझे छूने को

Poetry by Omendra Ratnu

उठूँ तुझे छूने को, लालायित मन से आऊँ , पा के तुझे प्रगाढ़ विश्राम में ,निश्चिंत ! क्या करूं अतिक्रमण ,ठिठक के रह जाऊं , करवट से तेरी उठी हलचल...
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मैंने देखा मौन का साम्राज्य

Poetry by Omendra Ratnu

वाणी के जगत के समानांतर, धारण किये उसे भी , किन्तु अस्पर्शित, अभेद्य , अप्रभावित, स्थापित एक वर्तुल में ,स्वयं में लीन विस्तीर्ण और अविभाज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य , वाणी के भरता घाव स्थायित्व से , गर्भवती स्त्री सा , स्वयं से ठीक विपरीत को पोषण दे , पूरी सहिष्णुता से, बिन राजा , बिन प्रजा , ये कैसा राज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य … भासता निष्टुर , किन्तु है करुणामय , बैठा अनमना सा, ढोता ब्रह्माण्ड को सहज ही , निश्चिन्त उपवास में रत , देता प्रवेश निस्पंद , विदा भी, बिन क्रंदन , परम अद्वैत में स्थित, न कुछ ग्राह्य , न त्याज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य
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अरी ओ आत्मा री

Poetry by Omendra Ratnu

अरी ओ आत्मा री ! कन्या ,भोली , कुंवारी ! हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़ ! महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई, अब तो चैतन्य...
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Anthology

Ink

Poetry by Simran

Speak, sing, write, act Till your voice can no more And your face can’t twitch a muscle And your hand cramps and becomes sore With blisters and splotches of ink...
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Held

Poetry by Arwa Qutbuddin

Held By earth By the realness of existence And all its illusions By warm stars in a fragrant night By shadows of clouds and torn leaves Held By the roots...
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