अरी ओ आत्मा री
अरी ओ आत्मा री

अरी ओ आत्मा री ! कन्या ,भोली , कुंवारी ! हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़ !

महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई, अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़ !

रूप ,गंध,स्पर्श ,शब्द से विरस होकर, अरूप, निशब्द, अस्पर्शित,निर्धूम से नाता जोड़ !

वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ? अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़ !

कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती , प्रेम और करुणा के संग साक्षी का रस निचोड़ !

अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !

अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी ! महाशून्य के साथ सगाई तेरी रची गयी !

Omendra Ratnu

Dr. Omendra Ratnu is a Jaipur based ENT surgeon who runs his own hospital. Survival and blossoming of Hindi Bhasha by enhancing it’s use and promoting Hindi literature is one of his core passions.

He has been writing poetry and articles in various newspapers and web portals of Bharat. He runs an NGO by the title of Nimittekam, with the main purpose of helping displaced Hindu refugees from Pakistan and integrating Dalit Sahodaras into Hindu mainstream. Issues of the survival of Sanatana Dharma are also one of his core concerns for which he roams around the world to raise funds and awareness. He is also a singer, composer, Geeta communicator, and a ground activist for Hindu causes. He has released a Bhajan album and a Ghazal album composed and sung by him.

Ouevre

मैंने देखा मौन का साम्राज्य

Poetry by Omendra Ratnu

वाणी के जगत के समानांतर, धारण किये उसे भी , किन्तु अस्पर्शित, अभेद्य , अप्रभावित, स्थापित एक वर्तुल में ,स्वयं में लीन विस्तीर्ण और अविभाज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य , वाणी के भरता घाव स्थायित्व से , गर्भवती स्त्री सा , स्वयं से ठीक विपरीत को पोषण दे , पूरी सहिष्णुता से, बिन राजा , बिन प्रजा , ये कैसा राज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य … भासता निष्टुर , किन्तु है करुणामय , बैठा अनमना सा, ढोता ब्रह्माण्ड को सहज ही , निश्चिन्त उपवास में रत , देता प्रवेश निस्पंद , विदा भी, बिन क्रंदन , परम अद्वैत में स्थित, न कुछ ग्राह्य , न त्याज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य
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अब प्यार हुआ इलज़ाम

Poetry by Omendra Ratnu

अब प्यार हुआ इलज़ाम यहाँ, है मक्कारों की पौ बारह, नफरत में जीना आसान है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहूँचे ! क्या शोर हुआ, क्या ज़ोर हुआ,यूँ मर मर के...
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लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए

Poetry by Omendra Ratnu

लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए , पर इस दिवाली पे आप बार बार आए … वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने , हर दस्तूर के हमको समझाना माने , स्मृतियों की पालकी सपनों...
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Anthology

ख़ामोशी


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Poetry by ख़ामोशी

हर आवाज़ के पीछे एक ख़ामोशी छुप्पी खड़ी है तुम आवाज़ों को मत छोड़ना बस आवाज़ों की लहरों पर तैरना सीख लो यह आवाज़ें तुम्हे अपने आगोश मे लेकर फिर...
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My longing has many faces

Poetry by Maura Horkan

The sad one who feels it can never be and cries big salty tears into the garden The other one who moves slowly around the many tasks to be done...
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Sky-Bird

Poetry by Pariksith Singh

To fly Is to be The infinite space To rise Into openness The vast opens as I My love of transparence Fills me now To flesh and marrow The journey...
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