लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए
लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए

लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए ,
पर इस दिवाली पे आप बार बार आए …

वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने ,
हर दस्तूर के हमको समझाना माने ,
स्मृतियों की पालकी सपनों के कहार लाये ,
इस दिवाली पे आप बार बार आए

वो मुहूरत में देरी पे जल्दी मचाना ,
वो रूठे हुओं को मनाना हँसाना ,
कितने भटके हुओं को उबार लाये
इस दिवाली पे आप बार बार आए ।
वो बढ़ बढ़ के सबका पटाखे दिखाना
वो बहुओं का दिन भर यूँ खाने बनाना,
अब किसी को भी क्यूँ वो दुलार आए,
इस दिवाली पे आप बार बार आए ।
वो भजनों की वाणी पे ध्यानस्थ होना,
वो डिंगल के दोहों का कंठस्थ होना ,
कितनी बिगड़ी हुई बातें सुधार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए !

Omendra Ratnu

Dr. Omendra Ratnu is a Jaipur based ENT surgeon who runs his own hospital. Survival and blossoming of Hindi Bhasha by enhancing it’s use and promoting Hindi literature is one of his core passions.

He has been writing poetry and articles in various newspapers and web portals of Bharat. He runs an NGO by the title of Nimittekam, with the main purpose of helping displaced Hindu refugees from Pakistan and integrating Dalit Sahodaras into Hindu mainstream. Issues of the survival of Sanatana Dharma are also one of his core concerns for which he roams around the world to raise funds and awareness. He is also a singer, composer, Geeta communicator, and a ground activist for Hindu causes. He has released a Bhajan album and a Ghazal album composed and sung by him.

Ouevre

रस्मो-रिवाज

Poetry by Omendra Ratnu

रस्मो-रिवाज वो निभाएं जिन्हें ग़रज़ हो दुनिया वालों से, ना रुसवाई का कोई डर था ना था खौफ पशेमान होने से , खुद को मिटाने की कसम पे चले हैं वफ़ा...
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मैंने देखा मौन का साम्राज्य

Poetry by Omendra Ratnu

वाणी के जगत के समानांतर, धारण किये उसे भी , किन्तु अस्पर्शित, अभेद्य , अप्रभावित, स्थापित एक वर्तुल में ,स्वयं में लीन विस्तीर्ण और अविभाज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य , वाणी के भरता घाव स्थायित्व से , गर्भवती स्त्री सा , स्वयं से ठीक विपरीत को पोषण दे , पूरी सहिष्णुता से, बिन राजा , बिन प्रजा , ये कैसा राज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य … भासता निष्टुर , किन्तु है करुणामय , बैठा अनमना सा, ढोता ब्रह्माण्ड को सहज ही , निश्चिन्त उपवास में रत , देता प्रवेश निस्पंद , विदा भी, बिन क्रंदन , परम अद्वैत में स्थित, न कुछ ग्राह्य , न त्याज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य
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आकाश नीचे उतर आया

Poetry by Omendra Ratnu

आज एक आकाश नीचे उतर आया करने आच्छादित मुझे, मेरे उपरान्त भी ,   अस्तित्व हुआ तरल झीनी चादर सा, चित्त हुआ सरल , जो था कातर सा,   तन...
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Anthology

Glass rose

Poetry by Simran

you used to use your thorns to protect the glass casing that you were in from breaking but soon your fragile shell was shattered and the shards of glass pierced...
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My longing has many faces

Poetry by Maura Horkan

The sad one who feels it can never be and cries big salty tears into the garden The other one who moves slowly around the many tasks to be done...
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जो रो ना सके वो जवानी क्या

Poetry by Omendra Ratnu

जो रो ना सके वो जवानी क्या ! जो हंस ना सके वो बुढ़ापा क्या ! जो चल ना सके वो हौसला क्या ! जो मिट ही जाए वो फासला...
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