रस्मो-रिवाज
रस्मो-रिवाज

रस्मो-रिवाज वो निभाएं जिन्हें ग़रज़ हो दुनिया वालों से,

ना रुसवाई का कोई डर था ना था खौफ पशेमान होने से ,

खुद को मिटाने की कसम पे चले हैं वफ़ा के दीवाने ,

आज़माना हो खुद को तो खोलते हैं हम सफीना , या फिर,

बस दामन बचा के निकल जा जुनूं के सैलाब वालों से।

Omendra Ratnu

Dr. Omendra Ratnu is a Jaipur based ENT surgeon who runs his own hospital. Survival and blossoming of Hindi Bhasha by enhancing it’s use and promoting Hindi literature is one of his core passions.

He has been writing poetry and articles in various newspapers and web portals of Bharat. He runs an NGO by the title of Nimittekam, with the main purpose of helping displaced Hindu refugees from Pakistan and integrating Dalit Sahodaras into Hindu mainstream. Issues of the survival of Sanatana Dharma are also one of his core concerns for which he roams around the world to raise funds and awareness. He is also a singer, composer, Geeta communicator, and a ground activist for Hindu causes. He has released a Bhajan album and a Ghazal album composed and sung by him.

Ouevre

मैंने देखा मौन का साम्राज्य

Poetry by Omendra Ratnu

वाणी के जगत के समानांतर, धारण किये उसे भी , किन्तु अस्पर्शित, अभेद्य , अप्रभावित, स्थापित एक वर्तुल में ,स्वयं में लीन विस्तीर्ण और अविभाज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य , वाणी के भरता घाव स्थायित्व से , गर्भवती स्त्री सा , स्वयं से ठीक विपरीत को पोषण दे , पूरी सहिष्णुता से, बिन राजा , बिन प्रजा , ये कैसा राज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य … भासता निष्टुर , किन्तु है करुणामय , बैठा अनमना सा, ढोता ब्रह्माण्ड को सहज ही , निश्चिन्त उपवास में रत , देता प्रवेश निस्पंद , विदा भी, बिन क्रंदन , परम अद्वैत में स्थित, न कुछ ग्राह्य , न त्याज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य
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मन के अनुसंधान समझ

Poetry by Omendra Ratnu

मन के अनुसंधान समझ, शब्दों के परिधान पहन …ये कौन आह जगी ? शीतलता से उत्तप्त, सभी स्मृतियों से विगत, क्षितिज पे जागती जोत सी ….ये कौन आह जगी ?...
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अब और क्या माँगू ?

Poetry by Omendra Ratnu

मैं तुझसे पा गया इतना , अब और क्या माँगू ? कि दामन भर गया मेरा, अब और क्या माँगू ? हद-ए-नज़र तक है यहाँ आलम मुफ़लिसी का मैं इतनी  रौनकों से...
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Anthology

Such total giving

Poetry by Pariksith Singh

Such total giving Back to you, the world Down to the marrow, the bones Such complete shedding of me Purge of will Adoration so deep it becomes surrender Submission such...
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सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है

Poetry by Omendra Ratnu

सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है, अँधेरी रातों में तेरी महक अब भी है !   टूटती नहीं ये खुमारी क्या करें, वजूद में मेरे घुली मिली,...
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Blues

Poetry by Neha Kothari

Were you looking for long? You can always find me Where? Oh you can find me where the blues meet. Look into the sifting clouds And follow their path You...
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