सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है
सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है

सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है,

अँधेरी रातों में तेरी महक अब भी है !

 

टूटती नहीं ये खुमारी क्या करें,

वजूद में मेरे घुली मिली, तू अब भी है !

 

जानता हूँ खूब नज़र फिर गयी तेरी,

दिल की तन्हाईयों में मगर , तू अब भी है !

 

तेरे होने, ना होने से अब फ़र्क नहीं कोई,

इस आशिकी के जुनून में ,तू अब भी है !

 

दौर-ए-हिज्र में हालांकि हुए घायल,

एहसास-ए-शुक्रमंदी में, तू अब भी है !

 

तिजारत की दुनिया रखे हिसाब तेरा,

इश्क में आज़ाद तू तब भी थी , तू अब भी है

Omendra Ratnu

Dr. Omendra Ratnu is a Jaipur based ENT surgeon who runs his own hospital. Survival and blossoming of Hindi Bhasha by enhancing it’s use and promoting Hindi literature is one of his core passions.

He has been writing poetry and articles in various newspapers and web portals of Bharat. He runs an NGO by the title of Nimittekam, with the main purpose of helping displaced Hindu refugees from Pakistan and integrating Dalit Sahodaras into Hindu mainstream. Issues of the survival of Sanatana Dharma are also one of his core concerns for which he roams around the world to raise funds and awareness. He is also a singer, composer, Geeta communicator, and a ground activist for Hindu causes. He has released a Bhajan album and a Ghazal album composed and sung by him.

Ouevre

उठूँ तुझे छूने को

Poetry by Omendra Ratnu

उठूँ तुझे छूने को, लालायित मन से आऊँ , पा के तुझे प्रगाढ़ विश्राम में ,निश्चिंत ! क्या करूं अतिक्रमण ,ठिठक के रह जाऊं , करवट से तेरी उठी हलचल...
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मन के अनुसंधान समझ

Poetry by Omendra Ratnu

मन के अनुसंधान समझ, शब्दों के परिधान पहन …ये कौन आह जगी ? शीतलता से उत्तप्त, सभी स्मृतियों से विगत, क्षितिज पे जागती जोत सी ….ये कौन आह जगी ?...
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लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए

Poetry by Omendra Ratnu

लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए , पर इस दिवाली पे आप बार बार आए … वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने , हर दस्तूर के हमको समझाना माने , स्मृतियों की पालकी सपनों...
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Anthology

Victory Dance

Poetry by Sanaya

Let me dance my Victory dance around the anarchy that crumbles Inside me. Rubber band arms stretch far out Collision Rejection Dismantle this machinery of misery, let each bolt fall...
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मैंने देखा मौन का साम्राज्य

Poetry by Omendra Ratnu

वाणी के जगत के समानांतर, धारण किये उसे भी , किन्तु अस्पर्शित, अभेद्य , अप्रभावित, स्थापित एक वर्तुल में ,स्वयं में लीन विस्तीर्ण और अविभाज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य , वाणी के भरता घाव स्थायित्व से , गर्भवती स्त्री सा , स्वयं से ठीक विपरीत को पोषण दे , पूरी सहिष्णुता से, बिन राजा , बिन प्रजा , ये कैसा राज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य … भासता निष्टुर , किन्तु है करुणामय , बैठा अनमना सा, ढोता ब्रह्माण्ड को सहज ही , निश्चिन्त उपवास में रत , देता प्रवेश निस्पंद , विदा भी, बिन क्रंदन , परम अद्वैत में स्थित, न कुछ ग्राह्य , न त्याज्य ! मैंने देखा मौन का साम्राज्य
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On The Edge

Poetry by Arwa Qutbuddin

Holy intoxication makes my spirit drunk I sip from the lake that holds a sacred moonbeam inside its black waters This beauty leaves me in rapture of the starless night...
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